गीता-पाठ सम्पूर्ण अध्यायो का हो बहुत अच्छा हैं | प्रारम्भ में थोड़ी शुरुवात भी महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं ! प्रत्येक घर में गीता का स्वर गूंजे, प्रत्येक वाणी पर गीता हो,हर नेत्र गीता पाठ से सार्थक हो ; गीता पाठ से कोई भी वंचित न हो-इसी के लिए यह प्रेणा-प्रयास हैं दिन का प्रारम्भ और विश्राम गीता -भावो के साथ भोजन के माध्यम से गीता का भाव -तत्व जीवन में उतरे इसलिए आओ निश्चित करे
गीता से दिन के शुरुआत,
विश्राम भी गीता भाव के साथ
गीता-पाठ कर भोजन पाये,
तनाव संशय भ्र्म दूर भगाये ||
प्रातः कालीन शलोक
विश्राम भी गीता भाव के साथ
गीता-पाठ कर भोजन पाये,
तनाव संशय भ्र्म दूर भगाये ||
प्रातः कालीन शलोक
कर त्याग मोह का तू जम योग में ,
सफलता या असफलता कुछ भी मिले |
मन को तू रख दोनों में ही समान ,
हैं अर्जुन ! इसी समता का योग नाम ||२/४८||
उद्धार अपना करो आप ही,
पतन में न गिरने दो खुद को कभी |
कि हैं आप ही मित्र अपना भी यह,
नही और ,शत्रु भी खुद अपना हैं ||६/५||
मेरी ही भक्ति में मन को लगा,
जो चिंतन करे बस मेरा ही सदा |
निरन्तर जो मुझ में जमे रहते हैं,
पूरा करुँ योग-क्षेम उनका मैं ||९/२२||
भोजन प्रसाद से पूर्व
बचा यज्ञ का अन्न खाते हैं जो ,
तो हो जाते हैं मुक्त पापो से वो |
पकाये जो अपने ही तन की लिये,
हैं पापी सदा खाते हैं पाप वे ||३/१३||
हवन ब्रह्म हवि ब्रह्म हैं कर्ता भी ब्रह्म,
हैं अग्नि भी ब्रह्म और आहूति भी ब्रह्म |
सिवा ब्रह्म की देखे कुछ भी न जो,
पाता हैं फल ब्रह्म रूपी ही वो ||४/२४||
रहकर मैं ही देह में सब जीवो की,
बनता सभी की हूँ जठराग्नि |
प्राण और अपान बन की मैं ही सदा,
पचाता हूँ अन्न चारो प्रकार का ||१५/१४||
रात्रि विश्राम से पूर्व
कर्म जितने भी करता हैं तू कभी,
खाता हैं कुछ या करे हवन ही |
दे दान या जो भी तप ही करे,
अर्जुन ! वह अर्पण तू कर सब मुझे ||९/२७||
चरणो में गिर करता प्रणाम हूँ,
कृपा करो मुझपे विनती करुँ |
पिता-पुत्र,सखा-मित्र,पति पत्नी को,
करे माफ़,वैसे ही मुझको करो ||११/४४||
आरोपित धर्म छोड़कर तू ये सब,
आ,एक मेरी ही ले शरण अब |
तुझे पापो से मुक्त कर दूँगा मैं,
चिंता न कर तू किसी भी तरह ||१८/६६||
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